छत्तीसगढ़ की अनोखी परंपरा! गोवर्धन पूजा में पुजारी पर से गुज़रते हैं सैकड़ों गाय-बैल, फिर भी नहीं आती एक खरोंच..



छत्तीसगढ़ टुडे न्यूज : (छग) गरियाबंद के मैनपुर कला गांव में निभाई गई अनोखी परंपरा

छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले का मैनपुर कला गांव एक बार फिर चर्चा में है। गोवर्धन पूजा के मौके पर यहां सैकड़ों साल पुरानी परंपरा निभाई गई, जिसमें गांव के सिरहा (स्थानीय पुजारी) के ऊपर से सैकड़ों गाय-बैल गुज़रते हैं। हैरानी की बात ये है कि इस दौरान पुजारी को एक खरोंच तक नहीं आती।


दैवीय शक्ति से जुड़ी सैकड़ों साल पुरानी प्रथा

ग्रामीणों के मुताबिक, यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और गांव को रोग-व्याधियों से मुक्त रखने का प्रतीक मानी जाती है। इस दिन गोबर से एक गोवर्धन पर्वत बनाया जाता है। इसके सामने गांव के दो सिरहा — कुंदरू यादव और जीवन यादव — बैठते हैं, जिन पर सिद्धगुरु या काछनगाजी सवार होते हैं।


पीढ़ियों से निभाई जा रही यह परंपरा

ग्रामीण बताते हैं कि कुंदरू यादव और जीवन यादव के दादा-परदादा भी देव सवार होकर इसी प्रथा को निभाते आए हैं। गांव के वरिष्ठ नागरिक झाखर डोमार सिंह नागेश और भुनेश्वर नागेश कहते हैं कि भले ही राजस्व रिकॉर्ड में गांव का उल्लेख 1921 से है, लेकिन यह परंपरा उससे भी बहुत पहले से चली आ रही है।


सिरहा को नहीं लगती खरोंच, लोगों की अटूट आस्था

पूजा के दौरान पूरे गांव के गोवंश को इकट्ठा किया जाता है और उन्हें सिरहा के ऊपर से गुजारा जाता है। यह देखने में भले खतरनाक लगता हो, लेकिन ग्रामीणों का मानना है कि दैवीय शक्ति के कारण सिरहा को कोई चोट नहीं लगती।


गोबर से बनी पर्वत की मिट्टी को घर ले जाते हैं लोग

अनुष्ठान खत्म होने के बाद ग्रामीण गोवर्धन पर्वत में इस्तेमाल हुए गोबर को अपने घर ले जाते हैं। इसे खेतों में छिड़कते हैं, घर के मुख्य द्वार पर लगाते हैं और तिलक के रूप में माथे पर लगाते हैं।



रोग-व्याधि से मुक्ति की मान्यता

ग्रामीणों की मान्यता है कि इस गोबर में पवित्रता होती है। इससे खेतों में फसलें सुरक्षित रहती हैं और चेचक जैसी बीमारियां गांव में नहीं आतीं। यही वजह है कि यह परंपरा आज भी पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।

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