महानदी में बेलगाम रेत खनन: मां कहने वाले आज चुप क्यों?
कुरूद। छत्तीसगढ़ के कुरूद विधानसभा क्षेत्र अंतर्गत ग्राम नारी, खट्टी और चंद्रसूर में अवैध रेत खनन का धंधा लगातार कई महीनों से बेधड़क जारी है। ग्रामीणों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने प्रशासनिक चुप्पी पर सवाल उठाए हैं। वे कह रहे हैं कि "जब महानदी को मां कहा जाता है, तब उसकी कोख को यूं कैसे लूटा जा सकता है?"
प्रशासन का दिखावा या लापरवाही?
इस क्षेत्र से विधायक अजय चंद्राकर हैं, और यहां के ग्रामीणों का आरोप है कि कई बार समाचार माध्यमों के जरिए इस अवैध खनन की जानकारी दी जा चुकी है, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि शासन-प्रशासन मात्र दिखावे के लिए मुहिम चलाते हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और है।
‘मां’ अभियान और रेत माफिया की हकीकत
इसी बीच कलेक्टर अविनाश मिश्रा के नेतृत्व में "मां" अभियान चलाया जा रहा है, जिसमें महानदी को 'नदी नहीं, मां का स्वरूप' कहा गया है। इस अभियान पर हजारों रुपये खर्च किए जा चुके हैं।
लेकिन यही महानदी अब रेत माफियाओं के हवाले कर दी गई है, जो दिन-रात इसके सीने को चीर कर रेत निकाल रहे हैं।
ग्राम विकास समिति का दखल और सरपंच का खुलासा
करेली बड़ी की सरपंच खेमलता साहू ने बड़ा खुलासा करते हुए बताया कि ग्राम विकास समिति के द्वारा नदी को रेत परिवहन के लिए बेचा गया है। सवाल यह उठता है कि क्या ग्राम समिति को नदी का दोहन करने का अधिकार है? और अगर नहीं, तो यह सौदा किसके संरक्षण में हुआ?
खनिज अधिकारी का जवाब और कार्रवाई की प्रतीक्षा
जब खनिज अधिकारी भारद्वाज से मोबाइल पर संपर्क किया गया, तो उन्होंने कहा कि "टीम को जल्द भेजकर कार्रवाई की जाएगी।"
लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि यह जवाब वे कई बार सुन चुके हैं। कार्रवाई कब होगी, यह अब देखने वाली बात होगी।
नदी की पुकार: क्या अब भी समय है?
आज सवाल उठ रहा है कि क्या वाकई महानदी मां है?
अगर हां, तो उसकी सुरक्षा का जिम्मा किसका है?
क्या हम केवल पोस्टर और प्रचार तक ही 'मां' कहेंगे, या उसके अस्तित्व की रक्षा भी करेंगे?
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(यह रिपोर्ट ग्रामीणों के बयानों और स्थानीय सूत्रों पर आधारित है। प्रशासन की ओर से किसी ठोस कार्रवाई की पुष्टि नहीं हुई है।)
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