हरिभूमि एक्सक्लूसिव : आंदोलनकारियों को भाजपा-कांग्रेस ने देशद्रोही-अमेरिकी एजेंट तक कहा:उन्हीं के संघर्ष से दिल्ली तक पहुंची मांग, 48 साल पहले ही अलग हो जाता छत्तीसगढ़

 

हरिभूमि एक्सक्लूसिव

आंदोलनकारियों को भाजपा-कांग्रेस ने देशद्रोही-अमेरिकी एजेंट तक कहा:उन्हीं के संघर्ष से दिल्ली तक पहुंची मांग, 48 साल पहले ही अलग हो जाता छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ आज अपना 26वां स्थापना दिवस मना रहा है। 1 नवंबर 2000 को अलग राज्य के रूप में छत्तीसगढ़ अस्तित्व में आया, लेकिन इसके पीछे कई दशकों का संघर्ष छिपा है। अलग राज्य के लिए लड़ने वाले आंदोलनकारियों को भाजपा और कांग्रेस के लोग देशद्रोही और अमेरिका का एजेंट तक कहते थे।

आंदोलनकारियों को सामाजिक, मानसिक और आर्थिक परेशानियां झेलनी पड़ीं। वे जेल गए, सरकारों के सामने अपनी मांग रखी और गांवों से लेकर दिल्ली तक आंदोलन किया। आज राज्य स्थापना दिवस के मौके पर हम आपको उन आंदोलनकारियों के संघर्ष की कहानी बता रहे हैं, जिन्होंने अलग छत्तीसगढ़ का सपना देखा और उसे पूरा करने के लिए अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा आंदोलन में लगा दिया।

छत्तीसगढ़ी समाज पार्टी के महासचिव दीनदयाल वर्मा बताते हैं कि अलग राज्य की मांग को संगठित रूप देने में छत्तीसगढ़ी समाज की अहम भूमिका रही। 16 मई 1965 को छत्तीसगढ़ी समाज की स्थापना हुई। इसी साल रायपुर के आरडी तिवारी स्कूल में पहला छत्तीसगढ़ी सम्मेलन हुआ। यहीं से अलग छत्तीसगढ़ राज्य की मांग को लेकर आंदोलन ने संगठित रूप लेना शुरू किया।

इस रिपोर्ट में पढ़िए राज्य निर्माण आंदोलन का संघर्ष, 48 साल पहले दिल्ली के प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में हुई ऐतिहासिक बैठक, जिसने अलग राज्य की मांग को नई दिशा दी और संसद घेराव की कहानी…

24 जुलाई 2000 को दिल्ली में संसद घेराव के दौरान पुलिस की रोक के बावजूद बैरिकेड्स पर चढ़कर नारेबाजी करते छत्तीसगढ़ी समाज और छत्तीसगढ़ी समाज पार्टी के कार्यकर्ता।



प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के निजी सचिव ने छत्तीसगढ़ी समाज के महासचिव दीनदयाल वर्मा को दिल्ली बुलाने के लिए पत्र भेजा था।

आंदोलनकारियों को कहते थे देशद्रोही और अमेरिका का एजेंट

छत्तीसगढ़ी समाज पार्टी के महासचिव दीनदयाल वर्मा बताते हैं कि छत्तीसगढ़ी समाज 1965 से शोषण के खिलाफ संघर्ष कर रहा है। शुरुआत में आंदोलन सीमित स्तर पर था, लेकिन 1970 के बाद इसकी आवाज गांवों और शहरों तक पहुंचने लगी। 1979 तक आंदोलन ने प्रदेशव्यापी रूप ले लिया। गांव, ब्लॉक, तहसील और जिला स्तर पर रैलियां निकाली गईं। लोगों में अलग राज्य की मांग को लेकर जागरूकता बढ़ी।

दीनदयाल वर्मा बताते हैं कि उस समय आंदोलनकारियों को कई तरह के विरोध का सामना करना पड़ता था। मध्यप्रदेश से अलग छत्तीसगढ़ राज्य की मांग उठाने पर भाजपा और कांग्रेस के लोग उन्हें देशद्रोही और अमेरिका का एजेंट तक कहते थे। इसके बावजूद आंदोलनकारी अपने उद्देश्य से पीछे नहीं हटे।


1965 से की थी अलग राज्य बनाने की मांग

छत्तीसगढ़ी समाज पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष (संगठन) अनिल दुबे ने बताया कि 16 मई 1965 को छत्तीसगढ़ी समाज की स्थापना हुई थी। इसी साल रायपुर के आरडी तिवारी स्कूल में पहला छत्तीसगढ़ी सम्मेलन हुआ। यहीं से अलग छत्तीसगढ़ राज्य के लिए आंदोलन की शुरुआत हुई।

इसके बाद 1967 में रायपुर के ईदगाह भाटा में बड़ा सम्मेलन हुआ। आचार्य नरेंद्र दुबे और रामानंद शुक्ला के नेतृत्व में अलग राज्य की मांग के समर्थन में 5 हजार हस्ताक्षर जुटाए गए। हर गांव और मुख्यालय में धरने और रैलियां होती रहीं।

रायपुर से दिल्ली तक गए जेल, संसद और विधानसभा में प्रदर्शन

अनिल दुबे बताते हैं कि छत्तीसगढ़ी समाज के लोगों ने शोषण के खिलाफ संघर्ष किया। आंदोलन की प्रेरणा उन्हें अपने गुरु से मिली। वे छात्र जीवन से ही इस आंदोलन से जुड़ गए थे।

उन्होंने बताया कि आंदोलन के दौरान उन्हें रायपुर, भोपाल और दिल्ली की जेल तक जाना पड़ा। संसद और विधानसभा के सामने भी प्रदर्शन किए गए। कई आंदोलनों में उन्हें पहली पंक्ति में शामिल होने का अवसर मिला।

राष्ट्रपति सचिवालय की ओर से छत्तीसगढ़ी समाज को भेजा गया पत्र।

1978 में रायपुर में निकाली गई थी बड़ी रैली

छत्तीसगढ़ समाज पार्टी के अध्यक्ष जीपी चंद्राकर बताते हैं कि छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण का आंदोलन जोर पकड़ रहा था। इसी दौरान 23 अक्टूबर 1978 को रायपुर में अलग छत्तीसगढ़ राज्य की मांग को लेकर ऐतिहासिक रैली निकाली गई।

PMO से मिलने दिल्ली गए छत्तीसगढ़ी समाज के 15 सदस्य

जीपी चंद्राकर बताते हैं कि पहले राज्य निर्माण की मांग को लेकर समाज की ओर से तत्कालीन राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपा गया था। यह ज्ञापन आगे तत्कालीन गृह मंत्री विद्या चरण शुक्ल के पास पहुंचा, लेकिन उन्होंने अलग राज्य की मांग पर ध्यान नहीं दिया। इसके कारण मांग आगे नहीं बढ़ सकी।

जीपी चंद्राकर के मुताबिक, 1978 में रैली के बाद राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के नाम फिर ज्ञापन सौंपा गया। इसके बाद प्रधानमंत्री कार्यालय से दिल्ली आने का बुलावा मिला।

उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ी समाज के अध्यक्ष और 15 प्रतिनिधि 2 दिसंबर को तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई से अलग राज्य के मुद्दे पर बात करने दिल्ली गए थे। प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व आचार्य नरेंद्र दुबे कर रहे थे। प्रधानमंत्री ने उन्हें विशेष सम्मान दिया।

आचार्य नरेंद्र दुबे स्वतंत्रता सेनानी थे और इमरजेंसी के दौरान MISA के तहत जेल में बंद रहे थे। प्रधानमंत्री से मुलाकात के लिए सिर्फ 15 मिनट का समय दिया गया था। प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री को एक विस्तृत मास्टर प्लान दिखाया।

इसमें छत्तीसगढ़ को आत्मनिर्भर बनाने, सिंचाई क्षमता बढ़ाने, ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत करने और रोजगार पैदा करने की योजनाएं शामिल थीं।

छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण की मांग को लेकर बड़ी संख्या में छत्तीसगढ़ी समाज के कार्यकर्ता दिल्ली के लाल किले पहुंचे थे।

आंकड़ों और तर्कों ने PM को प्रभावित किया

बैठक में प्रतिनिधिमंडल ने आंकड़ों के साथ बताया कि मध्यप्रदेश के राजस्व में छत्तीसगढ़ क्षेत्र का बड़ा योगदान है, लेकिन विकास के लिए यहां अनुपात के हिसाब से हिस्सा नहीं मिलता। संसाधनों से समृद्ध होने के बावजूद छत्तीसगढ़ लगातार पिछड़ रहा है।

इन बातों का प्रधानमंत्री पर असर पड़ा। पूरी चर्चा सुनने के बाद मोरारजी देसाई ने कहा कि वे छत्तीसगढ़ राज्य की मांग के समर्थन में हैं। अगर मध्यप्रदेश सरकार अलग छत्तीसगढ़ राज्य बनाने का प्रस्ताव पारित कर देती है, तो केंद्र सरकार इसमें देरी नहीं करेगी।

आंदोलनकारियों के मुताबिक यह पहली बार था जब किसी प्रधानमंत्री ने अलग राज्य की मांग पर सार्वजनिक रूप से सकारात्मक रुख दिखाया। यह आंदोलनकारियों के लिए बड़ी उपलब्धि थी। इससे पूरे प्रदेश में आंदोलन को नई ऊर्जा और भरोसा मिला।

आचार्य नरेंद्र दुबे के नेतृत्व में 1978 में रायपुर में ऐतिहासिक रैली निकाली गई थी, जिसमें 10 हजार से ज्यादा लोग शामिल हुए थे।

48 साल पहले ही बन जाता छत्तीसगढ़ राज्य

जीपी चंद्राकर बताते हैं कि जब प्रतिनिधिमंडल ने इस बारे में मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरेंद्र कुमार सकलेचा को पत्र लिखा, तो उन्होंने अलग छत्तीसगढ़ राज्य बनाने से मना कर दिया। यह राज्य निर्माण की राह में बड़ी रुकावट बन गया।

चंद्राकर के मुताबिक, छत्तीसगढ़ी समाज की दलीलों से प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई इतने प्रभावित हुए थे कि वे छत्तीसगढ़ को अलग राज्य बनाने के लिए हस्ताक्षर करने को तैयार थे, लेकिन राजनीतिक परिस्थितियों के चलते ऐसा नहीं हो सका।

बाद में मोरारजी देसाई की सरकार भी गिर गई। उनका कहना है कि अगर राजनीतिक अड़चनें नहीं आतीं, तो छत्तीसगढ़ आज से 48 साल पहले ही अलग राज्य बन गया होता।

जुलाई 2000 में किया संसद का घेराव

अनिल दुबे बताते हैं कि 1970 के बाद छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण का आंदोलन जनक्रांति का रूप लेने लगा। हर गांव और मुख्यालय में धरने और रैलियों का सिलसिला चलता रहा। 1978 में रायपुर के जयस्तंभ चौक पर हुई रैली में 10 हजार से 15 हजार लोग शामिल हुए थे। 1979 में छत्तीसगढ़ी वाहिनी का गठन किया गया।

इसके बाद भोपाल विधानसभा से लेकर दिल्ली में संसद तक घेराव और विरोध प्रदर्शन किए गए। छत्तीसगढ़ी समाज पार्टी के नेतृत्व में 24 जुलाई 2000 को संसद का घेराव किया गया। इसमें सैकड़ों कार्यकर्ता दिल्ली पहुंचे और संसद भवन के सामने प्रदर्शन किया।

आंदोलनकारियों ने राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री सचिवालय और लोकसभा सचिवालय तक ज्ञापन सौंपे। उस दिन उन्होंने 36 घंटे में छत्तीसगढ़ राज्य गठन की घोषणा करने की मांग रखी। इस आंदोलन में महिलाओं की भी बड़ी भागीदारी रही।

आंदोलनकारियों के मुताबिक, सामूहिक संघर्ष और लगातार उठाई गई मांगों के बाद आखिरकार तीन महीने बाद 1 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ अलग राज्य बना।

10 तस्वीरों में देखिए छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण की मांग को लेकर छत्तीसगढ़ी समाज का आंदोलन और संघर्ष-

28 मई 1979 को छत्तीसगढ़ी समाज पार्टी की ओर से रायपुर में विशाल रैली निकाली गई थी।












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